विगत कई वर्षोंसे मैं सृजन के बारे में सोचती रहीहूँ लेकिन उसे सही शब्द नहीं दे पा रही थी । तभी ओशो को पढते हुए निम्न वाक्य सटीक प्रतित हुए : कभी आपने नही सोचा होगा ,इतने पेंटर हुए, इतने मूर्तिकार हुए, इतने चित्रकार , इतने कवि,इतने आर्किटक्टे लेकिन स्त्री कोई एक बडी चित्रकार नही हुई? कोई एक स्त्री बडी आर्किटेकट ,वास्तुकला में अग्रणी नही हुई। कोई एक स्त्री ने बहुत बडे संगीत को जन्म नही दिया। कोई एक स्त्री ने कोई बहुत अद्भूत मूर्ति नही काटी । सृजन का सारा काम पुरूष ने किया है। और कई बार पुरूष को ऐसा खयाल आता है कि क्रिएटीव सृजनात्मक शक्ति हमारे पास हैं।स्त्री के पास कोई सृजनात्मक शक्ति नहीं हैं। लेकिन बात उल्टी हैं। स्त्री पुरूष को पैदा करने में इतना बडा श्रम कर लेती हैंकि और कोई सृजन करने की जरूरत नही रह जाती । स्त्री के पास अपना एक क्रिएटीव एक्ट हैं। एक सृजनात्मक कृत्य है,जो इतना बडा है कि पत्थर की मूर्ति बनाना और एक जीवित व्यक्ति को बडा करना लेकिन स्त्री के काम को हमने सहज स्वीकार कर लिया हैं।ं और इसीलिए स्त्री की सारी सृजनात्मक शक्ति उसके मां बनने में लग जाती हैं। उसके पास और कोई सृजन की न सुविधा बचती है,न शक्ति बचती है।न कोई आयाम ,कोई डायमेंशन बचता हैं। न सोचने का कोई सवाल हैं।
सृजन पर नारी की अनुभूति:ओशो के शब्द
December 5, 2009स्त्री उपेक्षिता में प्रस्तुत सीमोन द बोउवार के विचार जिन्होने मुझे हिला दिया
November 11, 2009स्त्री पूरी मानवता का आधा हिस्सा होते हुए भी एक जाति नही वह गुलामो की तरह जीती है। स्त्री भिन्न-भिन्न जातियों में, घरों में,अलग -अलग वर्गों में बिखरी हुई हैं। उसने अपनी चेतना को दबा दिया है, इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। वह पुरूष की सह अपराधिनी हैं। पुरूष के मुक्त करने से वह मुक्त नही हो जायेगी, स्वयं उसे अपनी अन्र्तआत्मा को जगाना होगा । उसे अपने संस्कारों,विचारों एवं सामाजिक बंधनो से मुक्त होना होगा। 
यंू तो स्त्री को देवी शक्तिरूप कहा है लेकिन व्यवहार में औरत की क्या हस्ति है। वह तो पैर की जूति हैं। क्या वह मानव औरत नही है? शरीर के अलावा उसकी ओर कोई पूँजी नही? इन विकल्पो के बिच सही तस्वीर क्या है?
स्त्री को अपनी लडाई खुद लडनी होगी । यह दुनिया पुरूषो ने बनाई हैं। स्त्री से पुरूष सहारा लेता है ।वह सदियो से ठगी गई हैं।यदि उसने कुछ स्वतंत्रता हासिल की भी है तो उतनी ही जितनी कि पुरूष ने उसे देना चाहा । या तो स्त्री को देवी के रूप में रखा गया या गुलाम की स्थिति में ।अपनी इन स्थ्तिियो को स्त्री ने सहर्ष स्वीकार किया ,बल्कि बहुत सी जगहो पर वह सह-अपराधिनी भी रही। आत्महत्या का यह भाव स्त्री में न केवल अपने लिये रहा,बल्कि वहअपनी बहु बेटी या अन्य स्त्रीयों के प्रति आत्मपिडितजनित द्वेष रखती आई हैं।
लगभग तीस वर्ष पूर्व लिखे गये विचार आज भी सत्य प्रतीत होते हैं। अतएव आज इन विचारो पर ध्यान देने की जरूरत हैं।
द्रौपदी का प्रश्न : नारी वस्तु है या व्यक्ति ?
November 4, 2009कौरव सभा में पाण्डवो के जुऐ में हारने पर द्रौपदी को घसीट कर लाया जाता है। तब द्रौपदी भरी सभा में पूछती है कि उसे महाराज युधिष्टिर स्वयं हारने के बाद कैसे दाव पर लगा सकते हैं। वह क्या वस्तु है? उसका अस्तित्व क्या है? तब कोई उसें उत्तर नही देता है। इस प्रश्न का उत्तर कि वह व्यक्ति है या वस्तु आज भी अनुत्तरित है। जुए में हारे पुरूष पांडव और दाँव लगाया नारी को ,द्रौपदी का क्या कसुर था?
हमारी श्रेष्ठतम सभ्यता,बडे-बडे महर्षि, ज्ञानी पण्डित इससे बचते रहे है। कुछ उत्तर जान कर भी चुप है आखिर क्यों ? भीष्म पितामह जैसे ज्ञानीयो ने उस दिन भी उत्तर नही दिआ था ,वे आज भी चुप है।
आज भी पिछडे परिवार में नारी आजाद नही है, स्त्री निर्णयकरने को स्वतंत्र नहीं हैं।आज भी दुर्योधनव दु:शासन जैसे व्यक्ति मौजूद हैं। हमारी पुरूष प्रधान सोच कब तक चलेगी?नारी कब तक वस्तु समझी जाती रहेगी ?क्या चेतन नारी व्यक्ति नही है ?नारी पुरूष से क्यो पुछती हैं । इसका उत्तर हमारे पास नही है क्या ?द्रौपदी क्यां प्रश्न पुरूषां से पूछती है? आज की द्रौपदी का प्रश्न स्वयं से हैं । हमें इसका उत्तर खोजना है। आधी दुनिया दोयम दर्जे की नागरिक क्यों हैं?
मैं भी इसी प्रश्न को लेकर ब्लाग जगत में आपके साथ हूँ।
Hello world!
October 31, 2009Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!
Posted by Meena Jain 